Wednesday, 1 August 2012

इबादत



मुकद्दर की लकीरों को बदलना सीख ले राही
देखना खुद ही एक दिन उगेंगे पंख सोने के

है काम कायर का झुकाना सिर उठाकर फिर
इबादत में उठाया हाथ आसमां थाम लेता है

प्रस्फुटित हर भाव मन में वेद लिखता है
मन रमे जब प्रेम में भगवान मिलता है

आस में आँखें टिकी हैं बंद लब कुछ बोलते
प्रेम है या बेबसी हर राज दिल का खोलते

चित्र गूगल से साभार 
01.08.2012

8 comments:

  1. प्रेम की भाषा सुनी तो जा ही सकती है अगर पर्याप्त बेचनी और अकुलाहट हो तो देखी भी जा सकती है.कभी कोशिश करके देखिएगा

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  2. कल 03/08/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. बहुत सुन्दर.....

    कोमल भाव समेटे हुए...

    अनु

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  4. सुंदर रचना !:)

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  5. भावमय करते शब्‍दों का संगम ..

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  6. है काम कायर का झुकाना सिर उठाकर फिर
    इबादत में उठाया हाथ आसमां थाम लेता है...

    क्या खूब...
    सादर बधाई.

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