Tuesday, 11 June 2013

हक



तुम कुंठित हो?
राम को तुमने जन्म नहीं दिया
तुम कुपित हो?
बुद्ध तुम्हारी कोख ने नहीं जना
क्यूँ क्रोधित हो?
तुम यशोदानंदन की माँ नहीं

तुम्हे गर्व नहीं?
कि तुम
एक विकलांग बेटी की माँ हो
तुम्हारे स्वाभिमान को ठेस लगी?
दे दिया जन्म पुत्री को

पुत्र ही जन लेती तो क्या हो जाता?
पुत्री ने हंसने का हक छीन लिया?

गर्व संतान पर?
या लिंग संरचना पर?
या क्रोध ईश्वर की कृति पर?
वा अपनी कोख पर?

कल वो करेंगे फैसला
सही गलत का

तब न तुम होगे न मैं
सिरजन को सृजन रहने दो

11 जून 2013
समर्पित माँ को
जिन्हें गर्व है अपनी पुत्री पर 

Thursday, 23 May 2013

आईना

कभी खुद से बातें करो, हर फासला तय हो जायेगा 

मैं आईना बनकर जब भी खड़ा होता हूँ
अक्श अपना देख बुत सी बन जाती हो

खता मेरी या नसीब तेरा तू ही जाने जानां
मैं खुदा तो नहीं सवाल दर सवाल कैसे करूँ


चलो तुम चार कदम फासला तय करने मंजिल
कारवां बन जायेगा गर पाक इरादे हों दिल में

चुनी खुद राह अपनी फिर नीची नज़रें क्यूँ हैं?
शर्मिन्दगी फैसले पर या जहां को जान लिया?

जब मन खाली है तितली बन जाती हो
जब मन भारी है सागर सी बन जाती हो

कैसे बतलायें किसको समझाये हर पल
चंचल ये मन क्यूं बन जाता सवाली है


ज़िन्दगी हसीन ही होती है जीने का अंदाज़ जुदा होता है
इश्क, इबादत, सौदा, कुछ भी मैं तो मानूं ये खुदा होता है

२२ मई २०१३
तथागत ब्लॉग के सर्जक
श्री राजेश कुमार सिंह को समर्पित
चित्र गूगल से साभार 

Thursday, 16 May 2013

गोदरिया बाबा / भरथरी

हे कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव 
नरियरा मुख्यमंत्री चिन्हित मार्ग पर स्थित गाँव अपने धर्म निर्वहन और राधावल्लभ
मंदिर संग दीवालों पर अंकित दुर्लभ चित्रकारी के लिए बीस कोस तक जाना जाता है।
यह मंदिर नाटक, लीला और रथयात्रा के लिये आज भी बड़ी श्रद्धा से स्मरण किया जाता
है दशहरा और रथयात्रा की परम्परा जीवंत है  एक समय इस मंदिर के सामने रायगढ़
नरेश राजा चक्रधर सिंह जी के राज नर्तक कार्तिक राम, उसके पुत्र रामलाल, पद्म श्री
कल्याण दास जी, और वेद मणि सिंह पखावज,तबला वादक भान सिंह, मेरे चाचा
श्री बीर सिंह, इसराज वादकसुख सागर सिंह, हारमोनियम पर नंदेली के पंचकौड़
प्रसाद जी, दद्दू खां जी, सुलक्षणा पंडित, श्यामशरण सिंह, श्री विशेश्वर सिंह जी
ने अपनी कला से दर्शकों को मंत्र मुग्ध किया।

ये एक संजोग और मेरा सौभाग्य है  कि दादा श्री भान सिंह के सानिध्य में  इन्हें सुनने
और इनकी कला वादन, गायन, नृत्य प्रदर्शन के दौरान संग रहने का सौभाग्य मिल गया।

मंदिर में संत, फ़क़ीर, और बाबा को आश्रय मिला ही गोदरिया बाबा जो भरथरी
चरित गायक ने भी अपना डेरा आज तक बनाया है लगभग १९६८ में कक्षा ८ वीं
की परीक्षा के दौरान अपनी छोटी बुआ करुणा दीदी के घर रुका था यह भी संजोग
कि आप श्री विसेश्वर सिंह की बहु हैं और घर मंदिर के सामने तब के भरथरी के
गाये गीत जेहन में आज भी कानों में गूंज रहे हैं

कल भी इनका अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाया था आज जिज्ञासावश आपसे बांटता हूँ

*
चाहे भाई कितना बैरी हो
उससे कुछ भी छुपाना नहीं चाहिये
**
चाहे पत्नी कितनी प्यारी हो
उससे सब कुछ बतलाना नहीं चाहिये
***
चाहे बेटी कितना प्यारी हो
उससे हर घर घुमाना नहीं चाहिये
****
चाहे बेटा कितना दुलारा हो
उससे सिर पर चढ़ाना नहीं चाहिये

ये गोदरिया बाबा बड़े निर्विकार भाव से भरथरी चरित के साथ इन गीतों को बड़े आनद से गुनगुनाते गाते है किन्तु जितना कह देना आसान है इन्हें इनके मूल बोल के साथ सुन पाना आसान नहीं।

आज इन कला मर्मज्ञों में श्री वेदमणि जी रायगढ़, श्री रामलाल जी रायगढ़, सुलक्षणा पंडित मुंबई ही वसुधा पर हैं शेष को मेरा सादर प्रणाम सहित नरियरा के बुजुर्गों को नमन जिन्होंने मंदिर बनवाया।

प्रार्थना रात को  आज भी मंदिर में गूंजती है
*****श्री रामचंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणं*****

१६ मई २०१३
चित्र गूगल से साभार
समर्पित स्व. शशि भूषण भाई को जिनकी कमी खलती है। 

Tuesday, 7 May 2013

आसां है?

आसां है दर्द में हंसना और ख़ुशी में आँखे छलकाना? 

*
बहुत आसां है?
दर्द में रोना
और
ख़ुशी में हंसना?
लेकिन
तुम्हारी आँखों से
मैंने भी सीख लिया
दर्द में हंसना
और
ख़ुशी में रोना

**
दर्द को सहेजना
दिल की गहराई में
बाँट लेना दर्द भी
ख़ुशी के पलों में
पलकों को बिन भिगोये
ये फन भी सिखला दिया
राह चलते चलते
एक दिन यूँ ही
***
मैं तो जानता ही नहीं
दर्द में हंसना और हँसाना
छलक जाते हैं आंसू
गम में
तुम्हारी भीगी आँखों में
झांकता हूँ जब

कभी कभी आँखे तेरी
धोखा दे जाती हैं

०७ मई २०१३

Friday, 19 April 2013

आधी उम्र



बीत जाते है
प्रतिदिन कई घंटे

नहाने, खाने, श्रृंगार, यात्रा, संकलन,
वार्ता, दान, ज्ञान, निर्माण, विध्वंस,
लड़ाई, झगडा, संतान उत्पत्ति,
शादी ब्याह, रख रखाव, लेन देन,
दायित्वों के निर्वहन में

आधी उम्र बीत गई
रात के अँधेरे में करवट बदलते
८ बरस बीत गये  बचपन के लाड़ में
शायद बीत जायेगा
५ बरस बुढापा में

जीवन का
जोड़, घटाव, गुणा और भाग

कितने कम समय के लिए

इतने समय के लिए
वैमनस्यता, बैर, राग द्वेष?
घृणा के लिए समय?
तो प्रेम क्यों नहीं?

कुछ पल ही सही
ज़िन्दगी जीने के लिए
चलो रोपते है
प्रेम तरु

पल्लवित होगा सींचेंगे श्रमकण
शाखाओं पर होंगे हरे पत्ते
फूल और फल लगें न लगे
कम से कम छांव तो मिलेगी

चित्र गूगल से साभार
चन्दन ज्वेलर्स के कर्ता धर्ता
श्री मदन मामा को समर्पित 

Thursday, 28 March 2013

पत्थर



*
पत्थरों के शहर में ही कांच के मिलते हैं कद्रदां
वरना पारस भी पत्थरों को कनक बनाता जाता

**
पत्थर दिल इंसान ही करता है प्यार बेइंतहा सबसे
पत्थरो से सदा प्रेम का दरिया बहता देखा है हमने

***
चोट से नरम पानी के पत्थर टूट जाता है
पत्थरों के बीच पत्थर चोट कहां पाता है

****
पत्थरों के शहर में पत्थर दिल इंसान मोम का देखा
अश्क आंखों में, अंगार जेहन में, दर्द इंसान का देखा

*****
पत्थरों से बनाये बुत को हर पल पूजता इंसान है
कम ही इंसान इंसान को पूजते हैं फ़ना होने पर
चित्र गूगल से साभार

Friday, 1 March 2013

शालीनता

शालीनता अकलतरा में


बचपन में अकलतरा अपने सौहाद्रता, सौजन्यता, प्रेम, सेवा, त्याग, सदभावना,
मिलनसारिता, अनेकता में एकता, और सबसे ऊपर अपने विनम्रता के लिए
जाना जाता था। शांत, सौम्य वातावरण में लोगो का मेल मिलाप सभी त्यौहारों में
दशहरा, दीपावली, भोजली, दुर्गा उत्सव,की बात अलग हैं, अकाल में कुएं से पानी
निकालते समय भी बाटते देखा प्रेम को खुले हाथों निर्विकार।

यह क़स्बा बाम्बे हावड़ा मुख्य रेल लाइन पर बिलासपुर से २८ कि.मी.दूर स्थित।

*****कल*****

बखरी गए थे क्या चन्दा के लिए?
पूछते थे नगर सेठ मुस्कुराकर
एक रूपया कम लिखना
महाराज के चंदे से

*****आज *****
१*
कल तक ऐतबार था जिन दोस्तों पर
अज़ीज़ थे
मैं भी था महफिलों में
आज मुंह फेर लिया मेरी लाचारी पे
लगते है अजीब
निकल जाते हैं सामने से
मुस्कुराकर
कोई शिकवा नहीं न गिला
न कोई तकलीफ
अब मैं उन्हें जान गया।

२**
लगता है सांस थम जायेगी
थाम लेता हूँ दम
कल तक दस्तक देता था
पत्नि और भाई के लिये
आज
ऐतबार हो गया खुद पे
खुदा से ज्यादा
मैं जानता हूँ
लोग आयेंगे
मुझसे मिलने
तब मैं मुंह फेर लूँगा

०२. ०३. २०१३
मित्र अनिल जैन को समर्पित
चित्र गूगल से साभार

[ बखरी अर्थात श्री राहुल कुमार सिंह जी *सिंहावलोकन * का घर ]
[ महाराज अर्थात श्री राजेंद्र कुमार सिंह जी या श्री सत्येन्द्र कुमार सिंह जी ]