Friday, 19 April 2013

आधी उम्र



बीत जाते है
प्रतिदिन कई घंटे

नहाने, खाने, श्रृंगार, यात्रा, संकलन,
वार्ता, दान, ज्ञान, निर्माण, विध्वंस,
लड़ाई, झगडा, संतान उत्पत्ति,
शादी ब्याह, रख रखाव, लेन देन,
दायित्वों के निर्वहन में

आधी उम्र बीत गई
रात के अँधेरे में करवट बदलते
८ बरस बीत गये  बचपन के लाड़ में
शायद बीत जायेगा
५ बरस बुढापा में

जीवन का
जोड़, घटाव, गुणा और भाग

कितने कम समय के लिए

इतने समय के लिए
वैमनस्यता, बैर, राग द्वेष?
घृणा के लिए समय?
तो प्रेम क्यों नहीं?

कुछ पल ही सही
ज़िन्दगी जीने के लिए
चलो रोपते है
प्रेम तरु

पल्लवित होगा सींचेंगे श्रमकण
शाखाओं पर होंगे हरे पत्ते
फूल और फल लगें न लगे
कम से कम छांव तो मिलेगी

चित्र गूगल से साभार
चन्दन ज्वेलर्स के कर्ता धर्ता
श्री मदन मामा को समर्पित 

Thursday, 28 March 2013

पत्थर



*
पत्थरों के शहर में ही कांच के मिलते हैं कद्रदां
वरना पारस भी पत्थरों को कनक बनाता जाता

**
पत्थर दिल इंसान ही करता है प्यार बेइंतहा सबसे
पत्थरो से सदा प्रेम का दरिया बहता देखा है हमने

***
चोट से नरम पानी के पत्थर टूट जाता है
पत्थरों के बीच पत्थर चोट कहां पाता है

****
पत्थरों के शहर में पत्थर दिल इंसान मोम का देखा
अश्क आंखों में, अंगार जेहन में, दर्द इंसान का देखा

*****
पत्थरों से बनाये बुत को हर पल पूजता इंसान है
कम ही इंसान इंसान को पूजते हैं फ़ना होने पर
चित्र गूगल से साभार

Friday, 1 March 2013

शालीनता

शालीनता अकलतरा में


बचपन में अकलतरा अपने सौहाद्रता, सौजन्यता, प्रेम, सेवा, त्याग, सदभावना,
मिलनसारिता, अनेकता में एकता, और सबसे ऊपर अपने विनम्रता के लिए
जाना जाता था। शांत, सौम्य वातावरण में लोगो का मेल मिलाप सभी त्यौहारों में
दशहरा, दीपावली, भोजली, दुर्गा उत्सव,की बात अलग हैं, अकाल में कुएं से पानी
निकालते समय भी बाटते देखा प्रेम को खुले हाथों निर्विकार।

यह क़स्बा बाम्बे हावड़ा मुख्य रेल लाइन पर बिलासपुर से २८ कि.मी.दूर स्थित।

*****कल*****

बखरी गए थे क्या चन्दा के लिए?
पूछते थे नगर सेठ मुस्कुराकर
एक रूपया कम लिखना
महाराज के चंदे से

*****आज *****
१*
कल तक ऐतबार था जिन दोस्तों पर
अज़ीज़ थे
मैं भी था महफिलों में
आज मुंह फेर लिया मेरी लाचारी पे
लगते है अजीब
निकल जाते हैं सामने से
मुस्कुराकर
कोई शिकवा नहीं न गिला
न कोई तकलीफ
अब मैं उन्हें जान गया।

२**
लगता है सांस थम जायेगी
थाम लेता हूँ दम
कल तक दस्तक देता था
पत्नि और भाई के लिये
आज
ऐतबार हो गया खुद पे
खुदा से ज्यादा
मैं जानता हूँ
लोग आयेंगे
मुझसे मिलने
तब मैं मुंह फेर लूँगा

०२. ०३. २०१३
मित्र अनिल जैन को समर्पित
चित्र गूगल से साभार

[ बखरी अर्थात श्री राहुल कुमार सिंह जी *सिंहावलोकन * का घर ]
[ महाराज अर्थात श्री राजेंद्र कुमार सिंह जी या श्री सत्येन्द्र कुमार सिंह जी ] 

Thursday, 31 January 2013

पंचर



ज़िन्दगी में क्या कुछ नहीं सहा जाता
लेकिन कभी कभी बयान करना कठिन हो जाता है
चलिये साझा करते हैं एक आपबीती खट्टी मीठी याद
जब हम चलते थे और लोग मुड़कर देख ही लेते थे

वर्ष 1994 भरी सुबह साइकल ने दगा दे दिया
तब सेलरी कम थी, पंचर हो गई साइकल रानी
कोरबा स्थित गेवरा रोड पण्डित जी की दुकान पहुंचे
पंचर बनाते देर देखकर किराये की साइकल मांगी

पण्डित जी ने प्रसन्न मुद्रा में नाम पूछा बोलिये?
आपका नाम टांक देता हूँ रजिस्टर में ताकि सनद रहे
हमने भी तुरत बतला दिया लिखिये रमाकांत सिंह
नाम पूरा होने के पहले कर्कश आवाज में डांट पड़ी

रखो साइकल और दुकान से बाहर निकल जाओ
हमने पंडित जी से पूछा किस बात के लिए गुर्राहट
उसने कहा बात मत करो गाड़ी रखो और दफा हो जाओ
अब हमें भी गुस्सा आ गया हमने भी कड़क हो कारण पूछा

पंडित ने बुरी नज़र से देखकर कहा जवाब क्यों दें
गाड़ी नहीं देनी है अपना रस्ता नापो समय खोटी मत करो
हमने भी आव देखा न ताव 500रूपया निकाल गल्ले पर पटका
गाड़ी की कीमत रखो नई गाड़ी दो, अपना मुह मत खोलो

क्या कहा मुह मत खोलें, अरे नहीं देनी है गाड़ी वाड़ी आगे बढ़ो
क्यों नहीं दोगे, दुकान काहे खोल रखे, हो देना पड़ेगा
बस वार्ता लाप तेज पर तेज, हमने पूछा कारन बतलाओ?
कारन क्या बतावें का नाम बताया रमाकांत?

बस ये ही करनवा है ये गलत नाम हम पचा नहीं पाये
नाम में क्या गड़बड़ी है नाम तो साफ सुथरा है
का बोले इ नाम साफ सुथरा है तो बाकि सब ख़राब?
अरे हाँ रमा याने लक्ष्मी, और कान्त याने पति

मतलब विष्णु भगवान
काहे का बिशनु भगवान

आज तक ऐ नाम का कौनो आदमी साफ सुथरा नहीं मिला
त तुम का सीधे बिशनु जी मिलोगे?
नहीं देना गाड़ी मुड़ मत पिरवाइए निकल लीजिये
गाड़ी लाख समझाने के बाद भी नहीं मिली

आज तक मुझे मेरे नाम का रहस्य समझ नहीं आया
आखिर क्या गड़बड़ झाला है मेरे नाम में?

01 फरवरी 2013

     

Sunday, 13 January 2013

मोती




ये अक्सर हो जाता है अक्सर हर बार क्यूँ तेरे साथ ही
मेरी माँ, बहन, बेटी मुझसे ही पूछ बैठते हैं हर पल क्यूँ?

न होगा हादसा न आंसूं न तमाशा बनने देंगे
न होगा मौन जन दुर्योधन सजायेगा सभा

ज़िन्दगी पास तेरे सोचता हूँ अक्सर हर लम्हा
तुझसे नाराज़ हूँ मैं या फिर नाराज़ मुझसे तू

बोयेंगे मोती के दाने उगायेंगे महल सपनों के
रचेंगे इस धरा पर हम अपने आस हाथों से

हौसला रख जवाब देने का जहां की रुत बदल जायेगी
सभी बेटी, बहन, बहू, माँ राह चैन के चलती जायेगी

14.01.2013
चित्र गूगल से  साभार   

Wednesday, 12 December 2012

यात्रा



सन 1974 मिनी पी. एस. सी. एक्जाम
प्रशिक्षार्थी शिक्षक के पद पर चयन
100 रुपये मासिक वेतन पर
21.07.1975-76 को पेंड्रा बी. टी. आई.

1976 में दैनिक मजदूरी थी 6.42 रुपये

सन 1976 77 दंतेवाडा समेली न 03 में पदस्थ
दंतेवाडा >नकुलनार >पालनार>समेली
पैदल यात्रा लगभग 63 कि मी एक दिन में
और वापसी 13 कि मी पालनार जंगलों से

दंतेवाडा हा से स्कूल में सहायक शिक्षक 1980 तक
1976 से 1977 तक 150 रुपये छात्रवृत्ति
प्राचार्य श्री लक्ष्मीकांत ज्योतिषी जी का मार्गदर्शन
1980 में बिलासपुर स्थानान्तरण

उतार चढ़ाव के बीच 1999 तक सेवाएँ
उ. व. शि. फिर प्रधान पाठक बन आज भी सेवारत
पेड़ों, बच्चों, और स्वार्थपरता की हद तक
खुद से खुदगर्ज की तरह प्रेम

नाम नहीं लूँगा मेरे गॉड ब्रदर का
जिनका मेरे जीवन में हर जगह प्रभाव
ब्लॉग, प्रशिक्षण, लेखन, जीवन शैली में
हर मोड़, हर राह पर जिसका मार्गदर्शन

अब मूल सन्देश

मुझे नौकरी पर किसी ने नहीं बुलाया था
मैंने अपनी गरज और शासन के शर्तों में काम किया
मैंने काम छोड़ा भी पकड़ा भी
आज शर्तों को ताक पर रखकर रोना क्यों?

बिना परेशानी के नौकरी छोड़ ज़रूरत मंद को दें
पैसे की खातिर बच्चों के भविष्य से खिलवाड़?
कोई तर्क या समझाइश नहीं स्वयं निर्णय लें
यदि आपका समय अनमोल तो बच्चों का जीवन?

सेवा शर्तों की कोई बाध्यता या बंधन?
नई अच्छी नौकरी मिलने पर क्या करेंगे?
किसके कहने पर सेवाएँ, नई राह तलाशें?
योग्य, समर्पित, निष्ठावान को मौका दें?

देश की कोई भी नौकरी राष्ट्र की किस नीति के तहत?

शिक्षा के गिरते मूल्य के लिए कौन जिम्मेदार?
निष्ठा, सेवा, समर्पण, पर प्रश्न चिन्ह क्यों?
100 रूपया चंदा देकर 10 दिन की मौज मस्ती?
एक बार पूरे दम से हक की लड़ाई क्यों नहीं?

मांग हक है, या भीख जो चार आने से टूट जाये?
ऐसे ही अनेक सवाल जवाब सर दर्द की तरह
शिक्षा और शिक्षकों के ही साथ खिलवाड़ क्यों?
हम सब अपने अपने उल्लू साधने में लगे हैं?

सर्वमान्य, सर्वग्राह्य, सर्वसुलभ हल क्यों नहीं?
राष्ट्र निर्माता, राष्ट्र के भविष्य से सौतेलापन ?

चलो ज्ञान यग्य में पूर्णाहुति देकर राष्ट्र के निर्माण में
आदरणीय परशुराम, द्रोण, विश्वामित्र का वरदहस्त प्राप्त करें

12.12.2012
ऐसा न सोचें मेरा जीवन इतना सरल सहज है .
पूरा जीवन खो गया यह सब लिखने में
आज तक अपने लिए कुछ भी नहीं जुटा पाया,
लेकिन कभी अफसोस नहीं हुआ .
ईश्वर ने जो कुछ भी दिया प्रभु प्रसाद , आभारी

Saturday, 3 November 2012

प्रेम



एक बार नारद जी शुश्रुत जी के पास गए
शुश्रुत जी रुग्ण लोगों को औषधि दे रहे थे
नारद जी ने कहा वैद्य जी मेरे पास एक सूची है
सूची में वो हैं जो ईश्वर को याद करते हैं

आप भी अपना नाम सूची में देख लें
नारद जी के आग्रह पर खंगाल डाली सूची
आदि से अंत तक हर सफा भरा था भक्तों से
शुश्रुत ने नहीं पाया तो अपना नाम कहीं

परोपकार में पेड़ फल दें नदियाँ बहें निरंतर क्यों
गाय दूध देती हैं शरीर भी परोपकार में
परोपकार में ही बीतता गया हर पल यूँ ही
एक बार फिर पहुच गए नारद जी शुश्रुत के पास

जैसे ही नारद जी पहुंचे शुश्रुत जी के पास सूची ले
इस बार उन्होंने कहा प्रभु क्षमा करें,औषधि-वितरण में
नारद जी ने मध्य में ही कहा आदरणीय इस बार
नई सूची का अवलोकन करें थोड़ा धीरज धरें

क्यों नाहक आप समय और औषधि को नष्ट करते हैं
हरने दें पीड़ा आप व्यर्थ न गवाएं अमूल्य समय
हर पन्ना शुरू से अंत तक भरा था भक्तों से
बस नहीं मिल पाया पहले पन्ने के बाद अंत तक

खिन्न मन से शुश्रुत जी ने नारद जी को लौटा दी सूची
इस बार इनका आग्रह रहा भविष्य में न करें ऐसा
बड़ी पीड़ा होती है लगता है पूरा जीवन व्यर्थ चला गया
बस मगन हूँ अपने धुन में बांटते-खोजते औषधि

शुश्रुत जी आपने एक सामने का पन्ना छोड़ दिया देखना
नारद जी के अनुरोध पर देखा और आश्चर्य से भर गये
पहले पन्ने पर पहला नाम वैद्य शुश्रुत जी अंकित देख
न हों चकित, न संशय, न शोक, न आकुलता

ये क्यों?

पहली सूची थी भक्तों की जो याद करते हैं प्रभु को
दूसरी सूची रही भगवान की जो भक्तों को याद करते हैं
*महत्वपूर्ण यह नहीं कि  आप किसे याद करते हैं*
**महत्वपूर्ण हो जाता है कि आपको कौन याद कर जाता है**

***ये रचना उसे समर्पित जो मुझे याद करता/करती है ***

****पिता श्री जीत सिंह से सुनी कहानी का लेखन****
13अगस्त 1994 रात्रि 8.45 दिन शनिवार
पिताजी का अवसान 14 अगस्त 1.28 दोपहर दिन रविवार

चित्र गूगल से साभार